Sunday, February 17, 2019

विदेशी कार निर्माताओं ने चेन्नई का खानपान कैसे बदल दिया?

अमरीका के सुशी व्यंजनों से परिचित होने से एक दशक पहले ही दक्षिण भारत के तटीय शहर चेन्नई का एक रेस्तरां स्थानीय टूना मछली से साशिमी बनाता था.

अकासाका नाम का यह छोटा जापानी रेस्तरां चेन्नई के भीड़भाड़ भरे चौराहे के पास एक बिल्डिंग के पीछे बना था.

इसके निजी कमरे और घर में बनी बार्ली टी चेन्नई के अति-व्यस्त और शोरगुल से भरे रेस्त्रां से बिल्कुल अलग थे.

स्थानीय रेस्तरां सांभर-वडा परोसते थे, जिनको खाने वालों के पास इतना समय भी नहीं होता कि वे कुर्सी पर बैठकर आराम से खाना खा सकें.

साल 1996 में जब यहां जापानी रेस्तरां खुला तो ये तुरंत क़ामयाब हो गया. रान तकायामा अकासाका में काम कर चुके हैं.

रान तकायामा कहते हैं, "कई बार तो यहां लोगो की इतनी लंबी लाइन लगती थी कि बिल्डिंग गेट से लेकर मेन रोड तक लोगों को खड़े होना पड़ता था."

रान तकायामा की राय में "ये रेस्तरां बहुत लोकप्रिय हुआ, क्योंकि यहां के प्रोडक्ट बहुत ही उम्दा थे." उससे पांच साल पहले (1991 में) भारत ने अपने बाज़ार को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोला था.

तब चेन्नई महानगर की जगह सिर्फ़ शहर जैसा था. जे जयललिता तमिलनाडु की नई-नई मुख्यमंत्री बनी थीं.

एफडीआई को मंजूरी मिलने के कुछ ही दिनों बाद वह सत्ता में आई थीं. उन्होंने कार बनाने वाली कंपनियों को चेन्नई लाने में सक्रियता दिखाई.

जयललिता की कोशिशें रंग लाईं. मित्सुबिशी, निसान, ह्युंदई और यामाहा ने चेन्नई के बाहर अपनी फैक्ट्रियां लगाईं.

ह्युंदई ने इस शहर पर ख़ास तौर पर असर छोड़ा, क्योंकि एक साथ 3,000 कोरियाई कर्मचारी इसकी फैक्ट्री में काम करने के लिए चेन्नई आए.

आज इस शहर में करीब 10 हजार विदेशी काम करते हैं, जिनमें से ज़्यादातर एशियाई हैं.

कार बनाने वाली फैक्ट्रियां स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) में बनी हैं, जो शहर से ज़्यादा दूर नहीं हैं.

श्रीपेरूम्बदूर एसईज़ेड चेन्नई से 50 किलोमीटर दूर ऑटोमोटिव कॉरीडोर पर बना है. हाईवे पर आते ही कोरियाई भाषा के संकेत चिह्न मिलने लगते हैं.

वहां कोरियाई सुपरमार्केट हैं, जापानी होटल हैं और एक बड़ा बुक स्टोर भी है. दक्षिण भारत की भयंकर गर्मी के बीच ये सारी सुविधाएं पूरी तरह वातानुकूलित हैं.

यहीं 20 साल पहले खुला अरिरंग भी है जो शहर का पहला कोरियाई रेस्त्रां है. अरिरंग को 50 साल के कोरियाई जो सांगयुन चलाते हैं.

सांगयुन ने भारत आकर ही क़ामयाबी पाई है. 1990 के दशक में वह एक कोरियाई कंपनी में काम करने चेन्नई आए थे. भोजन के प्रति दीवानगी के कारण वह यहीं रह गए.

अरिरंग के बाद उन्होंने दूसरे कई रेस्त्रां भी खोले. इनके साथ वह ह्युंदई की फैक्ट्री में कैंटीन भी चलाते हैं.

जो के कोरियाई व्यंजनों में पोर्क बॉसम (उबला हुआ सुअर का सुगंधित गोश्त) और डक बुलगोगी (भुना हुआ मसालेदार बत्तख) शामिल है.

ये आकर्षक दिखते हैं और जायके से भरपूर होते हैं. इन्हें देखकर रसम (टमाटर से बना सूप) और रेड फिश करी की याद आती है जिनको चेन्नई में बहुत पसंद किया जाता है.

जो के बनाए व्यंजनों को स्थानीय लोग भी चाव से खाते हैं. इस तरह वह यहां पाककला के अग्रदूत बन गए हैं.

जो कहते हैं, "इनसोल मेरे सबसे पुराने रेस्तरां में से एक था जिसने भारतीयों को कोरियाई व्यंजनों से परिचित कराया."

तमिलनाडु दुनिया के 10 सबसे प्रमुख ऑटोमोबाइल हब में से एक के रूप में विकसित हुआ है.

विकास के साथ उत्तर पूर्वी एशिया से यहां आने वाले विदेशियों का असर भी बढ़ा है.

कोरियाई शराब 'सोजू' यहां की सरकारी शराब दुकानों में मिलती है. युवाओं में के-पॉप (कोरियाई पॉप) की प्रतियोगिताएं लोकप्रिय हो रही हैं.

याकीटोरी (भुना हुआ चिकन) के लिए मशहूर जापानी रेस्तरां चेन कुराकू ने भी इस शहर में अपनी ब्रांच खोली है.

चेन्नई में जापानी और कोरियाई व्यंजन परोसने वाले करीब 50 रेस्तरां हैं, जिनमें कम से कम 1,000 स्थानीय लोग काम करते हैं.

जापानियों की दुकानें ज़्यादा बड़ी और महंगी हैं. कोरिया के कुछ लोग जापानी रेस्तरां भी चलाते हैं और कई जगहों पर दोनों तरह के व्यंजन मिलते हैं.

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