फ़रवरी 2017 में जब इसरो ने एक रॉकेट के ज़रिए 104 सैटलाइट को सफलता पूर्वक अंतरिक्ष में भेजा तो सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था अमरीका बनाम रूस भूल जाइए क्योंकि अंतरिक्ष में असली रेस तो एशिया में चल रही है.
इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत ने मंगलयान भेजने के बाद एक और कमाल कर दिखाया. एक रॉकेट के ज़रिए एक साथ 104 उपग्रह आज तक किसी देश ने सफलता पूर्वक अंतरिक्ष में नहीं भेजे थे. इससे पहले 2014 में रूस ने 37 उपग्रह भेजे थे.
ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में न्यूक्लियर एंड स्पेस पॉलिसी के प्रमुख राजेश्वरी पिल्लई राजगोपालन ने भारत की इस कामयाबी पर कहा था कि यह बहुत बड़ी उपलब्धि है और इससे साबित होता है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम काफ़ी आगे निकल चुका है.
एशिया में भारत, चीन और जापान अंतरिक्ष में एक लंबा सफ़र तय कर चुके हैं. इस मामले में दक्षिण कोरिया भी काफ़ी कुछ कर रहा है. कहा जा रहा है कि एशिया में अंतरिक्ष प्रोग्राम को लेकर जो गतिविधियां चल रही हैं वो 20वीं सदी के मध्य में शीत युद्ध के दौरान की अंतरिक्ष होड़ की याद दिलाता है.
बुधवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा करते हुए बताया कि भारत ने एंटी-सैटलाइट मिसाइल का सफलता पूर्वक परीक्षण किया है. इस परीक्षण में भारत ने 300 किलोमीटर दूर एक उपग्रह को मार गिराया.
दावा किया गया कि लंबे समय से भारत का यह परीक्षण अटका हुआ था. इस सफलता के साथ ही भारत अमरीका, रूस और चीन की पंक्ति में खड़ा हो गया है.
बुधवार को 11 बजकर दस मिनट पर ओडिशा के अब्दुल कलाम द्वीप से भारत ने थ्री-स्टेज इंटरसेप्टर मिसाइल से इसका परीक्षण किया. इसके एक घंटे बाद पीएम मोदी ने 'मिशन शक्ति' की सफलता की घोषणा की.
दो रॉकेट बुस्टर के साथ 18 टन की मिसाइल से 740 किलो के उपग्रह को लो अर्थ ऑर्बिट में तीन मिनट में मार गिराया गया.
भारत की इस कामयाबी का रणनीतिक महत्व भी बताया जा रहा है. सैटलाइट किलर मिसाइल से भारत अपने दुश्मन के उपग्रह को नष्ट कर सकता है.
हालांकि चीन ने इस क्षमता को 12 साल पहले ही हासिल कर लिया था. भारत ने इसका परीक्षण 300 किलोमीटर की ऊंचाई पर किया है लेकिन डीआरडीओ के वैज्ञानिकों का मानना है कि ज़रूरत पड़ने पर 1000 किलोमीटर तक भी जाया जा सकता है.
सेक्युर वर्ल्ड फाउंडेशन में प्रोग्राम और प्लानिंग के निदेशक ब्रायन वीडेन ने अमरीकी वेबसाइट एनपीआर से कहा है कि भारत 2007 से ही एंटी-सैटलाइट मिसाइल के परीक्षण की कोशिश कर रहा था.
वीडेन ने कहा है, ''चीन के पास यह क्षमता 2007 में ही आ गई थी और भारत तबसे इसे हासिल करने की कोशिश कर रहा था. भारत ने यह परीक्षण चीन को देखते हुए किया है. भारत इस मामले में चीन से पिछड़ने के कारण परेशान था.''
मैसाच्युसेट इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलजी में असोसिएट प्रोफ़ेसर विपिन नारंग का कहना है कि इस परीक्षण से भारत बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस प्रोग्राम से आगे बढ़ेगा.
उन्होंने कहा, ''उपग्रह को मार गिराने वाली मिसाइल के परीक्षण में सफलता भारत के लिए एक उम्मीद है कि वो बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस टेस्ट में छलांग लगा आगे निकलेगा.''
नारंग ने एनपीआर से कहा है, ''भारत की मिसाइल डिफेंस में दिलचस्पी एक और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को लेकर भी है. इसके संकेत हैं कि भारत अपनी परमाणु नीति को बदल रहा है. भारत पूरी तरह से युद्ध शुरू होने से पहले पाकिस्तान के ज़्यादातर परमाणु हथियारों को नष्ट करना चाहेगा. भारत को पाकिस्तान के रणनीतिक परमाणु सिस्टम को नष्ट करना होगा लेकिन इसके साथ ही बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस की भी ज़रूरत पड़ेगी. दूसरे शब्दों में कहें तो संभव है कि अगर पाकिस्तान परमाणु मिसाइल दागता है तो भारतीय डिफेंस सिस्टम उसे लैंड करने से पहले ही नष्ट कर दे.''
नारंग कहते हैं कि इस परीक्षण की घोषणा का समय महज एक संयोग नहीं है. कुछ ही दिनों में भारत में आम चुनाव होना वाला है और भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़े मुद्दे के तौर पर पेश कर रही है.
नारंग का कहना है कि प्रधानमंत्री ने टीवी पर घोषणा की जबकि चीन ने जब इसे अंजाम दिया था तो गोपनीय रखा था. नारंग के अनुसार यह परीक्षण बहुत ही राजनीतिक है.
विशेषज्ञों का मानना है कि बुधवार को जिस उपग्रह को निशाने पर लिया गया वो शायद माइक्रोसैट-आर था, जिसे जनवरी में छोड़ा गया था. बताया जा रहा है कि यह सैटलाइट पृथ्वी से 260 से 280 किलोमीटर की दूरी पर था और यह तुलनात्मक रूप से कम दूरी का टारगेट था.
इसका मतलब ये है कि इसका कचरा जल्दी पृथ्वी पर गिर जाएगा. वीडेन का मानना है कि ये बड़े ख़तरनाक हथियार होते हैं क्योंकि इससे बेशुमार कचरा पैदा होता है.
नेशनल इंटरेस्ट में रक्षा विशेषज्ञ जॉर्ज लियोपोल्ड ने लिखा है कि एंटी-सैटलाइट मिसाइल सिस्टम हासिल होने से सैन्य क्षमता में बढ़ोतरी लाज़िमी है.
जॉर्ज ने लिखा है कि इससे नेविगेशन, संचार और ख़ुफ़िया जानकारी मुकम्मल होती है. ज़ॉर्ज से अनुसार एयरफ़ोर्स के लिए यह काफ़ी मायने रखता है. 1962 में भारत ने अंतरिक्ष प्रोग्राम शुरू किया था और अब मंगयलान तक की यात्रा तय कर चुका है.
भारत ने इसे स्पेस में 2014 में महज 7.4 करोड़ डॉलर खर्च कर भेजा था. इसका खर्च हॉलीवुड की फ़िल्म 'ग्रैविटी' से भी कम आया. मंगलयान अब भारत का गर्व बना चुका है और इसे 2000 के नोट पर जगह दी गई है.
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सोसायटी फोर पॉलिसी स्टडीज के निदेशक उदय भास्कर ने सीएनएन से कहा है कि बाक़ी देशों की तुलना में भारत अंतरिक्ष में उपग्रह `60 फ़ीसदी से 70 फ़ीसदी कम क़ीमत पर भेजता है.
ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां एरोस्पस इंजीनियरों को बहुत कम सैलरी मिलती है. सीएनएन के अनुसार भारत में उच्च स्तर के एरोस्पेस इंजीनियरों की सैलरी महज 70 हज़ार प्रति महीने है.
चीन और रूस की एयरसैटलाइट क्षमता से भविष्य में मुक़ाबला करने के लिए अमरीका ने 2015 में 32 अरब डॉलर का निवेश किया था. चीन, रूस और अमरीका में इसे लेकर पहले से ही होड़ थी और इसमें अब भारत भी शामिल होता दिख रहा है.
Thursday, March 28, 2019
Friday, March 22, 2019
#ChristChurch: न्यूज़ीलैंड की मस्जिद पर हमले के बाद पाकिस्तान के चर्च में लगाई गई आग?
न्यूज़ीलैंड की मस्जिद में हुए हमले के जवाब में 'पाकिस्तान के इस्लामिक कट्टरपंथियों ने एक चर्च में आग' लगा दी है.
इस गंभीर दावे के साथ 30 सेकेंड का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है.
वीडियो में कुछ लोग चर्च के मुख्य द्वार के ऊपर चढ़े हुए दिखाई देते हैं और वीडियो का अंत होते-होते वो चर्च के धार्मिक चिह्न को तोड़कर नीचे गिरा देते हैं.
वीडियो में लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनी जा सकती है और इसके एक हिस्से में चर्च की इमारत से धुआँ उठता हुआ भी दिखाई देता है.
फ़ेसबुक और ट्विटर पर अभी इस वीडियो को कम ही लोगों ने शेयर किया है, लेकिन व्हॉट्सऐप के ज़रिए बीबीसी के कई पाठकों ने हमें यह वीडियो भेजकर इसकी सत्यता जाननी चाही है.
यूके के लंदन शहर में रहने वाली एक ट्विटर यूज़र @TheaDickinson ने भी इस वीडियो को पोस्ट करते हुए यही दावा किया है.
लेकिन 'पाकिस्तान के चर्च में आग लगाए जाने' के इस दावे को अपनी पड़ताल में हमने फ़र्ज़ी पाया है. वायरल वीडियो क़रीब 6 साल पुराना है.
वीडियो पाकिस्तान का नहीं
न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों (अल नूर और लिनवुड मस्जिद) में 15 मार्च को ब्रेंटन टैरंट नाम के एक हमलावर ने गोलीबारी की थी.
इस घटना में क़रीब 50 लोगों की मौत हो गई थी और 50 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे.
न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न मस्जिद में हुए इस हमले को 'आतंकवादी हमला' और देश के लिए 'काला दिन' बता चुकी हैं.
लेकिन जिस 30 सेकेंड के वीडियो को क्राइस्टचर्च हमले के 'बदले का वीडियो' बताया जा रहा है वो साल 2013 का वीडियो है.
रिवर्स इमेज सर्च से पता चलता है कि ये वीडियो पाकिस्तान का भी नहीं है, बल्कि मिस्र का है.
यू-ट्यूब पर 29 अगस्त 2013 को पब्लिश किये गए 6:44 सेकेंड के एक वीडियो में वायरल वीडियो का 30 सेकेंड का हिस्सा दिखाई देता है.
अगस्त 2013 में मिस्र के कम से कम 25 चर्चों में ईसाई-विरोधी गुटों ने हिंसा की थी. ये वायरल वीडियो उसी समय का है.
साल 2013 में ही कॉप्टिक ऑर्थोडॉक्स चर्च को भी निशाना बनाया गया था जिसके बारे में मान्यता है कि ये पचासवीं ईस्वी के आसपास बना था और अलेक्जेंड्रिया में स्थापित ईसाई धर्म के सबसे पुराने चर्चों में से एक रहा है.
मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के तख़्ता पलट को ईसाई विरोधी हिंसा का मुख्य कारण माना जाता है.
जुलाई 2013 में सेना के मिस्र पर क़ब्ज़ा कर लेने के बाद जब जनरल अब्दुल फ़तेह अल-सीसी ने टीवी पर राष्ट्रपति मोर्सी के अपदस्थ होने की घोषणा की थी, तब पोप टावाड्रोस द्वितीय उनके साथ खड़े नज़र आए थे.
उसके बाद से ही ईसाई समुदाय के लोग कुछ इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं.
तख़्ता पलट के समय पोप ने कहा था कि जनरल सीसी ने मिस्र का जो रोडमैप (ख़ाका) दिखाया है, उसे मिस्र के उन सम्मानित लोगों द्वारा तैयार किया गया है जो मिस्र का हित चाहते हैं.
पोप के इस बयान के बाद उन्हें कई दफ़ा मारने की धमकी दी गई थी. जबकि कई ईसाइयों की हत्या कर दी गई थी और उनके घरों को निशाना बनाया गया था.
मिस्र के अधिकतर ईसाई कॉप्टिक हैं जो प्राचीन मिस्रवासियों के वंशज हैं.
मिस्र की कुल जनसंख्या में लगभग दस प्रतिशत ईसाई हैं और सदियों से सुन्नी बहुल मुसलमानों के साथ शांति से रहते आए हैं.
इस गंभीर दावे के साथ 30 सेकेंड का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है.
वीडियो में कुछ लोग चर्च के मुख्य द्वार के ऊपर चढ़े हुए दिखाई देते हैं और वीडियो का अंत होते-होते वो चर्च के धार्मिक चिह्न को तोड़कर नीचे गिरा देते हैं.
वीडियो में लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनी जा सकती है और इसके एक हिस्से में चर्च की इमारत से धुआँ उठता हुआ भी दिखाई देता है.
फ़ेसबुक और ट्विटर पर अभी इस वीडियो को कम ही लोगों ने शेयर किया है, लेकिन व्हॉट्सऐप के ज़रिए बीबीसी के कई पाठकों ने हमें यह वीडियो भेजकर इसकी सत्यता जाननी चाही है.
यूके के लंदन शहर में रहने वाली एक ट्विटर यूज़र @TheaDickinson ने भी इस वीडियो को पोस्ट करते हुए यही दावा किया है.
लेकिन 'पाकिस्तान के चर्च में आग लगाए जाने' के इस दावे को अपनी पड़ताल में हमने फ़र्ज़ी पाया है. वायरल वीडियो क़रीब 6 साल पुराना है.
वीडियो पाकिस्तान का नहीं
न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों (अल नूर और लिनवुड मस्जिद) में 15 मार्च को ब्रेंटन टैरंट नाम के एक हमलावर ने गोलीबारी की थी.
इस घटना में क़रीब 50 लोगों की मौत हो गई थी और 50 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे.
न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न मस्जिद में हुए इस हमले को 'आतंकवादी हमला' और देश के लिए 'काला दिन' बता चुकी हैं.
लेकिन जिस 30 सेकेंड के वीडियो को क्राइस्टचर्च हमले के 'बदले का वीडियो' बताया जा रहा है वो साल 2013 का वीडियो है.
रिवर्स इमेज सर्च से पता चलता है कि ये वीडियो पाकिस्तान का भी नहीं है, बल्कि मिस्र का है.
यू-ट्यूब पर 29 अगस्त 2013 को पब्लिश किये गए 6:44 सेकेंड के एक वीडियो में वायरल वीडियो का 30 सेकेंड का हिस्सा दिखाई देता है.
अगस्त 2013 में मिस्र के कम से कम 25 चर्चों में ईसाई-विरोधी गुटों ने हिंसा की थी. ये वायरल वीडियो उसी समय का है.
साल 2013 में ही कॉप्टिक ऑर्थोडॉक्स चर्च को भी निशाना बनाया गया था जिसके बारे में मान्यता है कि ये पचासवीं ईस्वी के आसपास बना था और अलेक्जेंड्रिया में स्थापित ईसाई धर्म के सबसे पुराने चर्चों में से एक रहा है.
मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के तख़्ता पलट को ईसाई विरोधी हिंसा का मुख्य कारण माना जाता है.
जुलाई 2013 में सेना के मिस्र पर क़ब्ज़ा कर लेने के बाद जब जनरल अब्दुल फ़तेह अल-सीसी ने टीवी पर राष्ट्रपति मोर्सी के अपदस्थ होने की घोषणा की थी, तब पोप टावाड्रोस द्वितीय उनके साथ खड़े नज़र आए थे.
उसके बाद से ही ईसाई समुदाय के लोग कुछ इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं.
तख़्ता पलट के समय पोप ने कहा था कि जनरल सीसी ने मिस्र का जो रोडमैप (ख़ाका) दिखाया है, उसे मिस्र के उन सम्मानित लोगों द्वारा तैयार किया गया है जो मिस्र का हित चाहते हैं.
पोप के इस बयान के बाद उन्हें कई दफ़ा मारने की धमकी दी गई थी. जबकि कई ईसाइयों की हत्या कर दी गई थी और उनके घरों को निशाना बनाया गया था.
मिस्र के अधिकतर ईसाई कॉप्टिक हैं जो प्राचीन मिस्रवासियों के वंशज हैं.
मिस्र की कुल जनसंख्या में लगभग दस प्रतिशत ईसाई हैं और सदियों से सुन्नी बहुल मुसलमानों के साथ शांति से रहते आए हैं.
Thursday, March 14, 2019
जब अजित डोभाल से पूछा गया- तुम हिन्दू हो?
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ख़ास माना जाता है. ऐसा नहीं है कि डोभाल मोदी के पीएम बनने के बाद बीजेपी के क़रीब आए. डोभाल को लालकृष्ण आडवाणी भी काफ़ी तवज्जो देते थे.
कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी डोभाल को किसी नेता की तरह निशाने पर ले रहे हैं. डोभाल की पहचान एक तेज़-तर्रार जासूस और रक्षा विशेषज्ञ की रही है. लेकिन हाल के दिनों में भारत पर हुए कई आतंकी हमले और पड़ोसियों से ख़राब हुए संबंधों के कारण डोभाल की नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसी सप्ताह कहा था कि पुलवामा हमले के दोषी मसूद अज़हर को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ख़ुद ही विमान में कंधार (अफ़गानिस्तान) छोड़कर आए थे.
हालांकि आधकारिक रिकॉर्ड के अनुसार मसूद अज़हर समेत तीन चरमपंथियों को भारत से कंधार ले जाने वाले विमान के दिल्ली से उड़ान भरने से पहले ही अजित डोभाल (जो उस वक्त इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम करते थे) कंधार में ही मौजूद थे.
कांग्रेस के मीडिया सेल के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने एक के बाद एक ट्वीट कर कहा है, "आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में NSA के अजित डोभाल ने कांग्रेस-UPA सरकार की नीति को राष्ट्र हितों में बताया. 'UPA सरकार हाईजैकिंग को लेकर ठोस नीति लाई है- न कोई रियायत और न आतंकवादियों से बातचीत." भाजपा सरकार इस तरह की हिम्मत क्यों नहीं दिखा रही है."
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि "जैसा कि एनएसए अजित डोभाल ने कहा था मसूद अज़हर को रिहा करना राजनैतिक फैसला था. अगर ये भाजपा सरकार का फ़ैसला था तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा."
रणदीप सुरजेवाला ने साल 2010 का विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में प्रकाशित एक लेख का लिंक भी ट्वीट किया है.
पत्रकार हैरिंदर बवेजा को दिए इस इंटरव्यू में अजित डोभाल कहते हैं कि "कंधार हाईजैक के वक्त उन्हें ये पता चल गया था कि मसूद अज़हर बेहद अहम नाम है और सुरक्षा और ख़ुफ़िया जानकारी के अनुसार उसको रिहा करना एक ग़लती थी. ऐसा नहीं होना चहिए था. लेकिन एक बड़े राजनीतिक... ये फ़ैसला लेना उनका काम था."
हालांकि एक अन्य सवाल के उत्तर में अजित डोभाल कहते हैं "सुरक्षा के लिहाज़ से सरकार के सभी फ़ैसले मानने होते हैं. राजनीतिक सोच-समझ और व्यापक राष्ट्र हित के आधार पर अगर ये फ़ैसला लिया गया है तो ज़ाहिर है ये मानना होगा."
इस विवाद के मद्देनज़र एक नज़र डालते हैं कि 1999 के उस वाक़ये पर जब भारतीय एयरलाइन्स के विमान का अपहरण हुआ था, और जानते हैं कि अपहरण को दौरान तालिबान से बातचीत करने वाले भारतीय दल में अजित डोभाल की क्या भूमिका थी.
बात 1988 की है. स्वर्ण मंदिर के पास जहाँ एक ज़माने में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तूती बोलती थी, वहाँ अमृतसर के लोगों और ख़ालिस्तानी अलगाववादियों ने एक रिक्शावाले को बहुत तन्मयता से रिक्शा चलाते देखा. वो इस इलाक़े में नया था. वैसा ही लग रहा था जैसे आम तौर से रिक्शावाले लगते हैं. लेकिन फिर भी ख़ालिस्तानियों को उस पर कुछ-कुछ शक हो चला था.
स्वर्ण मंदिर की पवित्र दीवारों के आसपास ख़ुफ़ियातंत्र के पैतरों और जवाबी पैतरों के बीच उस रिक्शा वाले को ख़ालिस्तानियों को ये विश्वास दिलाने में दस दिन लग गए कि उसे आईएसआई ने उनकी मदद के लिए भेजा है.
ऑपरेशन ब्लैक थंडर से दो दिन पहले वो रिक्शावाला स्वर्ण मंदिर के अहाते में घुसा और पृथकतावादियों की असली पोज़ीशन और संख्या के बारे में महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया जानकारी लेकर बाहर आया. वो रिक्शावाला और कोई नहीं भारत सरकार के वर्तमान सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल थे.
ख़ुफ़िया तंत्र के अलिखित क़ानून का पालन करते हुए डोभाल को नज़दीक से जानने वाले लोग इस कहानी को सुनकर तुरंत कहते हैं कि इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है, लेकिन ये साफ़ पढ़ा जा सकता है कि इसे सुन कर उनके चेहरे पर एक ख़ास क़िस्म की मुस्कान आ जाती है.
बहुत इसरार करने और नाम न बताने की शर्त पर इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक पूर्व अधिकारी बताते हैं, "इस ऑप्रेशन में बहुत बड़ा जोख़िम था लेकिन हमारे सुरक्षा बलों को ख़ालिस्तानियों की योजना का पूरा ख़ाका अजित डोभाल ने ही उपलब्ध कराया था. नक्शे, हथियारों और लड़ाकों की छिपे होने की सटीक जानकारी डोभाल ही बाहर निकाल कर लाए थे."
इसी तरह अस्सी के दशक में डोभाल की वजह से ही भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी मिज़ोरम में पृथकतावादियों के शीर्ष नेतृत्व को भेदने में सफल रही थी और चोटी के चार बाग़ी नेताओं ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने हथियार डाले थे.
डोभाल के मातहत काम कर चुके एक अधिकारी बताते हैं, "हम लोगों पर कोई ड्रेस कोड लागू नहीं था. हम लोग कुर्ता पायजामा, लुंगी और साधारण चप्पल पहन कर घूमा करते थे. सीमा पार जासूसी के लिए जाने से पहले हम लोग दाढ़ी बढ़ाते थे."
वो कहते हैं, "अंडर कवर रहना सीखने के लिए हम लोग जूते बनाने तक का काम सीखते थे ताकि हम टारगेटेड इलाक़े में मोची का काम करते हुए ख़ुफ़िया जानकारी जमा कर सकें."
कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी डोभाल को किसी नेता की तरह निशाने पर ले रहे हैं. डोभाल की पहचान एक तेज़-तर्रार जासूस और रक्षा विशेषज्ञ की रही है. लेकिन हाल के दिनों में भारत पर हुए कई आतंकी हमले और पड़ोसियों से ख़राब हुए संबंधों के कारण डोभाल की नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसी सप्ताह कहा था कि पुलवामा हमले के दोषी मसूद अज़हर को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ख़ुद ही विमान में कंधार (अफ़गानिस्तान) छोड़कर आए थे.
हालांकि आधकारिक रिकॉर्ड के अनुसार मसूद अज़हर समेत तीन चरमपंथियों को भारत से कंधार ले जाने वाले विमान के दिल्ली से उड़ान भरने से पहले ही अजित डोभाल (जो उस वक्त इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम करते थे) कंधार में ही मौजूद थे.
कांग्रेस के मीडिया सेल के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने एक के बाद एक ट्वीट कर कहा है, "आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में NSA के अजित डोभाल ने कांग्रेस-UPA सरकार की नीति को राष्ट्र हितों में बताया. 'UPA सरकार हाईजैकिंग को लेकर ठोस नीति लाई है- न कोई रियायत और न आतंकवादियों से बातचीत." भाजपा सरकार इस तरह की हिम्मत क्यों नहीं दिखा रही है."
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि "जैसा कि एनएसए अजित डोभाल ने कहा था मसूद अज़हर को रिहा करना राजनैतिक फैसला था. अगर ये भाजपा सरकार का फ़ैसला था तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा."
रणदीप सुरजेवाला ने साल 2010 का विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में प्रकाशित एक लेख का लिंक भी ट्वीट किया है.
पत्रकार हैरिंदर बवेजा को दिए इस इंटरव्यू में अजित डोभाल कहते हैं कि "कंधार हाईजैक के वक्त उन्हें ये पता चल गया था कि मसूद अज़हर बेहद अहम नाम है और सुरक्षा और ख़ुफ़िया जानकारी के अनुसार उसको रिहा करना एक ग़लती थी. ऐसा नहीं होना चहिए था. लेकिन एक बड़े राजनीतिक... ये फ़ैसला लेना उनका काम था."
हालांकि एक अन्य सवाल के उत्तर में अजित डोभाल कहते हैं "सुरक्षा के लिहाज़ से सरकार के सभी फ़ैसले मानने होते हैं. राजनीतिक सोच-समझ और व्यापक राष्ट्र हित के आधार पर अगर ये फ़ैसला लिया गया है तो ज़ाहिर है ये मानना होगा."
इस विवाद के मद्देनज़र एक नज़र डालते हैं कि 1999 के उस वाक़ये पर जब भारतीय एयरलाइन्स के विमान का अपहरण हुआ था, और जानते हैं कि अपहरण को दौरान तालिबान से बातचीत करने वाले भारतीय दल में अजित डोभाल की क्या भूमिका थी.
बात 1988 की है. स्वर्ण मंदिर के पास जहाँ एक ज़माने में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तूती बोलती थी, वहाँ अमृतसर के लोगों और ख़ालिस्तानी अलगाववादियों ने एक रिक्शावाले को बहुत तन्मयता से रिक्शा चलाते देखा. वो इस इलाक़े में नया था. वैसा ही लग रहा था जैसे आम तौर से रिक्शावाले लगते हैं. लेकिन फिर भी ख़ालिस्तानियों को उस पर कुछ-कुछ शक हो चला था.
स्वर्ण मंदिर की पवित्र दीवारों के आसपास ख़ुफ़ियातंत्र के पैतरों और जवाबी पैतरों के बीच उस रिक्शा वाले को ख़ालिस्तानियों को ये विश्वास दिलाने में दस दिन लग गए कि उसे आईएसआई ने उनकी मदद के लिए भेजा है.
ऑपरेशन ब्लैक थंडर से दो दिन पहले वो रिक्शावाला स्वर्ण मंदिर के अहाते में घुसा और पृथकतावादियों की असली पोज़ीशन और संख्या के बारे में महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया जानकारी लेकर बाहर आया. वो रिक्शावाला और कोई नहीं भारत सरकार के वर्तमान सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल थे.
ख़ुफ़िया तंत्र के अलिखित क़ानून का पालन करते हुए डोभाल को नज़दीक से जानने वाले लोग इस कहानी को सुनकर तुरंत कहते हैं कि इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है, लेकिन ये साफ़ पढ़ा जा सकता है कि इसे सुन कर उनके चेहरे पर एक ख़ास क़िस्म की मुस्कान आ जाती है.
बहुत इसरार करने और नाम न बताने की शर्त पर इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक पूर्व अधिकारी बताते हैं, "इस ऑप्रेशन में बहुत बड़ा जोख़िम था लेकिन हमारे सुरक्षा बलों को ख़ालिस्तानियों की योजना का पूरा ख़ाका अजित डोभाल ने ही उपलब्ध कराया था. नक्शे, हथियारों और लड़ाकों की छिपे होने की सटीक जानकारी डोभाल ही बाहर निकाल कर लाए थे."
इसी तरह अस्सी के दशक में डोभाल की वजह से ही भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी मिज़ोरम में पृथकतावादियों के शीर्ष नेतृत्व को भेदने में सफल रही थी और चोटी के चार बाग़ी नेताओं ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने हथियार डाले थे.
डोभाल के मातहत काम कर चुके एक अधिकारी बताते हैं, "हम लोगों पर कोई ड्रेस कोड लागू नहीं था. हम लोग कुर्ता पायजामा, लुंगी और साधारण चप्पल पहन कर घूमा करते थे. सीमा पार जासूसी के लिए जाने से पहले हम लोग दाढ़ी बढ़ाते थे."
वो कहते हैं, "अंडर कवर रहना सीखने के लिए हम लोग जूते बनाने तक का काम सीखते थे ताकि हम टारगेटेड इलाक़े में मोची का काम करते हुए ख़ुफ़िया जानकारी जमा कर सकें."
Friday, March 1, 2019
मसूद अज़हर बहुत बीमार हैं, घर से नहीं निकल सकते: पाक विदेश मंत्री
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि उनकी जानकारी के अनुसार जैश-ए-मोहम्मद के सबसे बड़े नेता मसूद अज़हर पाकिस्तान में ही हैं.
जब उनसे पूछा गया कि क्या मसूद पाकिस्तान में हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, "हाँ, वो पाकिस्तान में ही हैं."
इंटरव्यू कर रहीं नामी पत्रकार क्रिस्टियाना अमनपोर ने पूछा कि पाकिस्तान उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं करता?
इस पर पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा, "वे पाकिस्तान में ही हैं, वे बीमार हैं, वे इतने बीमार हैं कि अपने घर से बाहर भी नहीं निकल सकते. वे बहुत बीमार हैं."
सीएनएन की पत्रकार ने पूछा कि सब कुछ जानते-समझते हुए भी मसूद अज़हर का नाम आतंकवादियों की सूची में नहीं डाला जा रहा है, आपके कहने पर चीन संयुक्त राष्ट्र में इससे जुड़े प्रस्ताव को वीटो करता रहा है. क्या मौजूदा हालत में तनाव कम करने के लिए अब आप अपना रवैया बदलेंगे?
इसके जवाब में कुरैशी ने कहा, "हम ऐसे हर कदम के लिए खुला रवैया रखते हैं जिससे दोनों देशों के बीच तनाव कम हो सके. अगर आपके पास (भारत के पास) कोई ठोस सबूत है तो आइए बैठकर बात करते हैं, बातचीत की शुरूआत करिए, हम भी वाजिब तरीके से पेश आएँगे."
जब पाक विदेश मंत्री से पूछा गया कि मसूद अज़हर की वजह से दोनों देशों के बीच इतना तनाव रहता है, फिर भी आप कुछ क्यों नहीं करते? इसके जवाब में उन्होंने कहा, "अगर वे (भारत) ठोस सबूत देते हैं जो पाकिस्तान की अदालतों को मंज़ूर हो, क्योंकि मामला तो अदालत में ही जाएगा. अगर सबूत हैं तो हमारे साथ शेयर करें ताकि हम जनता को (पाकिस्तान की) राज़ी कर सकें, और अपने देश की स्वतंत्र न्यायपालिका को संतुष्ट कर सकें."
क्या आपको हमलों में उनकी भूमिका को लेकर संदेह है? इसके जवाब में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा, "बात मेरे शक करने या न करने की नहीं है, मामले को अदालत में जाना है."
पुलवामा हमले के लिए मसूद ज़िम्मेदार
14 फरवरी 2019 को जम्मू कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ़ के एक काफिले पर हमला हुआ था जिसमें भारत के 40 से अधिक जवानों की मौत हो गई थी.
इस हमले की ज़िम्मेदारी जैश ए मोहम्मद ने ली थी.
इसके जवाब में 25-26 फरवरी की दरम्यानी रात को भारत ने दावा किया कि वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान में मौजूद चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के कई ठिकानों को तबाह कर दिया है.
पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने इसकी पुष्टि की, हालांकि उन्होंने जान-माल के किसी तरह के नुक़सान से इनकार किया. पाकिस्तान ने कहा कि भारतीय वायु सेना के विमान सीमा में घुसे ज़रुर थे लेकिन वो हड़बड़ी में बम गिरा कर लौट आए.
इसके उत्तर में पाकिस्तान ने कहा कि इसका जवाब वो देंगे लेकिन "जगह और समय वो खुद चुनेंगे."
इसके बाद 27 फरवरी को पाकिस्तान ने कहा कि उनकी वायु सेना ने बुधवार सवेरे भारत प्रशासित कश्मीर में छह ठिकानों पर हमले किए हैं. इसके बाद पाकिस्तान ने कहा कि उन्होंने दो भारतीय लड़कू विमानों को गिराया है जिसमें से एक उनके इलाक़े में गिरा है.
पाकिस्तान की तरफ गिरे विमान को उड़ाने वाले भारतीय पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को पाकिस्तान से हिरासत में ले लिया हालांकि बाद में पाकिस्तान ने कहा कि वो शुक्रवार को उन्हें भारत को सौंप देगा.
जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर का नाम सबसे पहले चर्चा में आया 1999 में. इस साल हुए कंधार विमान अपहरण मामले में 160 लोगों की जान बचाने के लिए भारत को मसूद अज़हर सहित तीन चरमपंथियों को रिहा करना पड़ा था.
इसके बाद मसूद अज़हर ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की मदद से जैश-ए-मोहम्मद बनाया.
इससे पहले मसूद अज़हर हरक़त उल अंसार का हिस्सा था. भारत के कश्मीर में 1994 में मसूद को पकड़ा गया था जिसके बाद से 1999 में रिहाई तक अज़हर को जम्मू की कोट भलवाल जेल में रखा गया था.
भारत 2001 संसद हमले समेत कई बड़े हमलों के लिए अज़हर की संस्था को ज़िम्मेदार मानता है.
भारत ने हाल के पठानकोट हमले का आरोप भी जैश पर लगाया है.
भारत अज़हर मसूद को अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी घोषित करवाना चाहता है. लेकिन चीन हर बार वीटो कर देता है.
जब उनसे पूछा गया कि क्या मसूद पाकिस्तान में हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, "हाँ, वो पाकिस्तान में ही हैं."
इंटरव्यू कर रहीं नामी पत्रकार क्रिस्टियाना अमनपोर ने पूछा कि पाकिस्तान उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं करता?
इस पर पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा, "वे पाकिस्तान में ही हैं, वे बीमार हैं, वे इतने बीमार हैं कि अपने घर से बाहर भी नहीं निकल सकते. वे बहुत बीमार हैं."
सीएनएन की पत्रकार ने पूछा कि सब कुछ जानते-समझते हुए भी मसूद अज़हर का नाम आतंकवादियों की सूची में नहीं डाला जा रहा है, आपके कहने पर चीन संयुक्त राष्ट्र में इससे जुड़े प्रस्ताव को वीटो करता रहा है. क्या मौजूदा हालत में तनाव कम करने के लिए अब आप अपना रवैया बदलेंगे?
इसके जवाब में कुरैशी ने कहा, "हम ऐसे हर कदम के लिए खुला रवैया रखते हैं जिससे दोनों देशों के बीच तनाव कम हो सके. अगर आपके पास (भारत के पास) कोई ठोस सबूत है तो आइए बैठकर बात करते हैं, बातचीत की शुरूआत करिए, हम भी वाजिब तरीके से पेश आएँगे."
जब पाक विदेश मंत्री से पूछा गया कि मसूद अज़हर की वजह से दोनों देशों के बीच इतना तनाव रहता है, फिर भी आप कुछ क्यों नहीं करते? इसके जवाब में उन्होंने कहा, "अगर वे (भारत) ठोस सबूत देते हैं जो पाकिस्तान की अदालतों को मंज़ूर हो, क्योंकि मामला तो अदालत में ही जाएगा. अगर सबूत हैं तो हमारे साथ शेयर करें ताकि हम जनता को (पाकिस्तान की) राज़ी कर सकें, और अपने देश की स्वतंत्र न्यायपालिका को संतुष्ट कर सकें."
क्या आपको हमलों में उनकी भूमिका को लेकर संदेह है? इसके जवाब में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा, "बात मेरे शक करने या न करने की नहीं है, मामले को अदालत में जाना है."
पुलवामा हमले के लिए मसूद ज़िम्मेदार
14 फरवरी 2019 को जम्मू कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ़ के एक काफिले पर हमला हुआ था जिसमें भारत के 40 से अधिक जवानों की मौत हो गई थी.
इस हमले की ज़िम्मेदारी जैश ए मोहम्मद ने ली थी.
इसके जवाब में 25-26 फरवरी की दरम्यानी रात को भारत ने दावा किया कि वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान में मौजूद चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के कई ठिकानों को तबाह कर दिया है.
पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने इसकी पुष्टि की, हालांकि उन्होंने जान-माल के किसी तरह के नुक़सान से इनकार किया. पाकिस्तान ने कहा कि भारतीय वायु सेना के विमान सीमा में घुसे ज़रुर थे लेकिन वो हड़बड़ी में बम गिरा कर लौट आए.
इसके उत्तर में पाकिस्तान ने कहा कि इसका जवाब वो देंगे लेकिन "जगह और समय वो खुद चुनेंगे."
इसके बाद 27 फरवरी को पाकिस्तान ने कहा कि उनकी वायु सेना ने बुधवार सवेरे भारत प्रशासित कश्मीर में छह ठिकानों पर हमले किए हैं. इसके बाद पाकिस्तान ने कहा कि उन्होंने दो भारतीय लड़कू विमानों को गिराया है जिसमें से एक उनके इलाक़े में गिरा है.
पाकिस्तान की तरफ गिरे विमान को उड़ाने वाले भारतीय पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को पाकिस्तान से हिरासत में ले लिया हालांकि बाद में पाकिस्तान ने कहा कि वो शुक्रवार को उन्हें भारत को सौंप देगा.
जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर का नाम सबसे पहले चर्चा में आया 1999 में. इस साल हुए कंधार विमान अपहरण मामले में 160 लोगों की जान बचाने के लिए भारत को मसूद अज़हर सहित तीन चरमपंथियों को रिहा करना पड़ा था.
इसके बाद मसूद अज़हर ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की मदद से जैश-ए-मोहम्मद बनाया.
इससे पहले मसूद अज़हर हरक़त उल अंसार का हिस्सा था. भारत के कश्मीर में 1994 में मसूद को पकड़ा गया था जिसके बाद से 1999 में रिहाई तक अज़हर को जम्मू की कोट भलवाल जेल में रखा गया था.
भारत 2001 संसद हमले समेत कई बड़े हमलों के लिए अज़हर की संस्था को ज़िम्मेदार मानता है.
भारत ने हाल के पठानकोट हमले का आरोप भी जैश पर लगाया है.
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