हमारे शरीर के अंदर और बाहर हज़ारों क़िस्म के कीटाणु और दूसरे छोटे जीव आबाद होते हैं. इन्हें माइक्रोबायोम कहते हैं.
कुछ ख़राब बैक्टीरिया हमें बीमार कर देते हैं. तो, कुछ हमें सेहतमंद रखने के लिए ज़रूरी हैं. हमारी बड़ी आंत में अरबों की तादाद में माइक्रो-ऑर्गेनिज़्म होते हैं.
इनमें कीटाणु, वायरस, फफूंद और जीवों की दूसरी क़िस्में होती हैं. वैज्ञानिक अब इस माइक्रोबायोम को इंसान के शरीर का एक अंग कहने लगे हैं.
हर इंसान में अलग-अलग तरह के माइक्रोबायोम होते हैं. इनका ताल्लुक़ किसी इंसान के खान-पान, रहन-सहन, भूख और मूड से होता है.
हालांकि इस दिशा में काफ़ी रिसर्च हो चुकी हैं. लेकिन, इन माइक्रोबायोम का हमारी सेहत में कितना अहम रोल है, इस बारे में कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है.
मिसाल के लिए ज़्यादा प्रोटीन और कम फ़ायबर लेने से कैंसर जैसा मर्ज़ पैदा करने वाले सेल पैदा होने की गुंजाइश ज़्यादा होती है.
ख़ास तौर से जानवरों का गोश्त इसके लिए अहम रोल निभाता है. वहीं, रेशेदार खाना लेने से पेट में जलन की शिकायत कम होती है.
पेट साफ़ रहता है जिससे रोगों से लड़ने की ताक़त बढ़ जाती है. इस संबंध में अभी तक जितनी रिसर्च की गई हैं, उन सभी का सैम्पल साइज़ बहुत छोटा रहा है.
लिहाज़ा अब बड़ा सैंपल साइज़ लेकर बड़े पैमाने पर रिसर्च की जा रही है.
मिसाल के लिए अमरीकन गट स्टडी प्रोजेक्ट के तहत क़रीब एक हज़ार अमरीकियों की आंत के माइक्रोबायोम पर रिसर्च की जा रही है.
इस प्रोजेक्ट के साइंटिफिक डायरेक्टर डेनियल मैक्डोनाल्ड के मुताबिक़, "अभी तक की रिसर्च के मुताबिक़ जिन लोगों के खाने में फल और सब्ज़ियां ज़्यादा शामिल थीं..."
"उनकी आंत में कई तरह के माइक्रोबायोम पाए गए जो कि काफ़ी सेहतमंद थे."
"हालांकि अभी ये कहना मुश्किल है कि अगर फल सब्ज़ी ज़्यादा खाने वालों को किसी दूसरी तरह का खाना दिया जाए तो उनके माइक्रोबायोम पर इसका क्या असर पड़ेगा."
बीते कुछ वर्षों में प्रो-बायोटिक्स को लेकर लोगों में जागरूकता कुछ ज़्यादा ही बढ़ी है. बाज़ार में ना सिर्फ़ प्रोबायोटिक्स के सप्लीमेंट मौजूद हैं.
बल्कि कई तरह के अन्य प्रोडक्ट भी उपलब्ध हैं जो ज़ायक़े के लिए खाए जाते हैं. जैसे कि प्रोबायोटिक दही.
दरअसल, प्रोबायोटिक्स ऐसे बैक्टीरिया हैं जो रोगनिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं. कई तरह की पेट की बीमारियों, ख़ास तौर से अल्सर के इलाज में इनसे काफ़ी मदद मिलती है.
हालांकि इनका इस्तेमाल कितना और कब तक करना चाहिए, इस पर अभी रिसर्च जारी है.
अपनी रिसर्च के आधार पर इसराइल के प्रोफ़ेसर एरन एलिनाव का कहना है कि हर इंसान को प्रोबायोटिक्स फ़ायदा ही करे, ये ज़रूरी नहीं.
उन्होंने 25 लोगों को दो ग्रुप में बांट कर ये रिसर्च की थी. एक वो ग्रुप था जिनकी बड़ी आंत में ऐसे माइक्रोबायोम मौजूद थे जो प्रोबायोटिक्स के साथ तालमेल बैठा सकते थे.
ऐसे लोगों को प्रोबायोटिक्स लेने का फ़ायदा हुआ. लेकिन दूसरा वो ग्रुप था जिनकी बड़ी आंत में प्रोबायोटिक्स के साथ तालमेल बैठाने वाले जीवाणु नहीं थे.
ऐसे लोगों को इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ. हालांकि इस रिसर्च का सैम्पल साइज़ बहुत छोटा था.
सटीक जवाब पाने के लिए ज़्यादा बड़े सैम्पल साइज़ पर रिसर्च की जा रही है. इसके बाद ये भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किस शख़्स को कौन से प्रोबायोटिक्स लेने चाहिए.
सेहतमंद ज़िंदगी जीने में शरीर के भीतर पलने वाले जीवाणुओं का बहुत बड़ा और अहम रोल होता है.
बच्चे की पैदाइश के चंद हफ़्तों बाद ही तय हो जाता है कि बच्चा कितना सेहतमंद रहने वाला है.
लिंडसे हाल क्वाडरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ बायोसाइंस की माइक्रोबायोम रिसर्च लीडर हैं.
लिंडसे हाल का कहना है कि बच्चे की पैदाइश के समय सबसे पहले उसका वास्ता बच्चेदानी से निकलने वाले पानी से होता है, जिसमें सबसे ज़्यादा बैक्टीरिया होते हैं.
"ये बैक्टीरिया बच्चे की सेहत के लिए ज़्यादा ज़रूरी होते हैं. इसीलिए क़ुदरती तौर पर पैदा बच्चों की रोग निरोधक क्षमता ऑपरेशन से पैदा बच्चों की तुलना में ज़्यादा होती है."
Wednesday, January 30, 2019
Tuesday, January 22, 2019
अमरीका: सेना में ट्रांसजेंडर बैन पर सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के साथ
अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को ट्रांसजेंडर्स को सेना में जाने से रोकने की नीति लागू करने के लिए हरी झंडी दे दी है.
अमरीका के शीर्ष कोर्ट ने ट्रंप ने प्रशासन के इस फ़ैसले को 5-4 से मंज़ूर किया. हालांकि निचली अदालतों में इस नीति को चुनौती देने के मामले चलते रहेंगे.
सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने ट्रंप प्रशासन के इस फ़ैसले का विरोध किया.
इस नीति के तहत ट्रांसजेंडर लोगों को सेना में आने से रोका जाएगा.
प्रशासन का कहना है कि ट्रांसजेंडर लोगों को नियुक्त करने से सेना के प्रभाव और क्षमता पर बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है.
ट्रंप से पहले राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा के समय ट्रांसजेंडरों को सेना में भर्ती करने की नीति को लागू किया था. इस नीति के तहत न केवल ट्रांसजेंडर सेना में भर्ती हो सकते थे, बल्कि उन्हें लिंग सर्जरी के लिए भी सरकारी मदद मिलने का प्रावधान किया गया था.
इस नीति के तहत सेना को 1 जुलाई, 2017 को ट्रांसजेंडर लोगों की भर्ती शुरू करनी थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इस सीमा को 1 जनवरी, 2018 तक बढ़ा दिया और उसके बाद नीति को पूरी तरह समाप्त करने का फैसला ले लिया.
हालांकि, सेना में ट्रांसजेंडर लोगों की भर्ती पर रोक को अदालत में कई बार चुनौती दी गई, जिसके बाद एक परिवर्तित नीति लाई गयी जिसमें भी ट्रांसजेंडर लोगों की सेवाओं पर व्यापक पाबंदियां रखी गईं. बाद में इसे भी निलंबित कर दिया गया.
पूर्व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने इस नीति को उन ट्रांसजेंडरों तक सीमित कर दिया था, जिनका जन्मजात लिंग उनकी पहचान से मेल नहीं खाता. अमरीकी रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार फिलहाल करीब 8,980 ट्रांसजेंडर सक्रिय रूप से सेना में हैं.
बीबीसी के उत्तरी अमरीका संवाददाता एंथनी ज़र्चर का कहना है कि इस मुद्दे पर लड़ाई आगे भी जारी रहेगी. "ये सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट की एक कार्रवाई है और इसे कोर्ट की राय नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना ज़रूर है कि इस फ़ैसले के बाद रूढ़िवादी ताक़तें राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति सहानुभूति रखने लगेंगी और इस मुद्दे पर और ज़ोर से आवाज़ उठाएंगी."
राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी का दावा कर चुकी डेमोक्रेट सांसद कमला हैरिस ने ट्वीट किया, "सेना में ट्रांसजेंडर लोगों में हमारे देश की सेवा करने का साहस है और वो ऐसा करने के योग्य हैं. हमें इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नी होगी."
अमरीका के शीर्ष कोर्ट ने ट्रंप ने प्रशासन के इस फ़ैसले को 5-4 से मंज़ूर किया. हालांकि निचली अदालतों में इस नीति को चुनौती देने के मामले चलते रहेंगे.
सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने ट्रंप प्रशासन के इस फ़ैसले का विरोध किया.
इस नीति के तहत ट्रांसजेंडर लोगों को सेना में आने से रोका जाएगा.
प्रशासन का कहना है कि ट्रांसजेंडर लोगों को नियुक्त करने से सेना के प्रभाव और क्षमता पर बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है.
ट्रंप से पहले राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा के समय ट्रांसजेंडरों को सेना में भर्ती करने की नीति को लागू किया था. इस नीति के तहत न केवल ट्रांसजेंडर सेना में भर्ती हो सकते थे, बल्कि उन्हें लिंग सर्जरी के लिए भी सरकारी मदद मिलने का प्रावधान किया गया था.
इस नीति के तहत सेना को 1 जुलाई, 2017 को ट्रांसजेंडर लोगों की भर्ती शुरू करनी थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इस सीमा को 1 जनवरी, 2018 तक बढ़ा दिया और उसके बाद नीति को पूरी तरह समाप्त करने का फैसला ले लिया.
हालांकि, सेना में ट्रांसजेंडर लोगों की भर्ती पर रोक को अदालत में कई बार चुनौती दी गई, जिसके बाद एक परिवर्तित नीति लाई गयी जिसमें भी ट्रांसजेंडर लोगों की सेवाओं पर व्यापक पाबंदियां रखी गईं. बाद में इसे भी निलंबित कर दिया गया.
पूर्व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने इस नीति को उन ट्रांसजेंडरों तक सीमित कर दिया था, जिनका जन्मजात लिंग उनकी पहचान से मेल नहीं खाता. अमरीकी रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार फिलहाल करीब 8,980 ट्रांसजेंडर सक्रिय रूप से सेना में हैं.
बीबीसी के उत्तरी अमरीका संवाददाता एंथनी ज़र्चर का कहना है कि इस मुद्दे पर लड़ाई आगे भी जारी रहेगी. "ये सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट की एक कार्रवाई है और इसे कोर्ट की राय नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना ज़रूर है कि इस फ़ैसले के बाद रूढ़िवादी ताक़तें राष्ट्रपति ट्रंप के प्रति सहानुभूति रखने लगेंगी और इस मुद्दे पर और ज़ोर से आवाज़ उठाएंगी."
राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी का दावा कर चुकी डेमोक्रेट सांसद कमला हैरिस ने ट्वीट किया, "सेना में ट्रांसजेंडर लोगों में हमारे देश की सेवा करने का साहस है और वो ऐसा करने के योग्य हैं. हमें इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नी होगी."
Thursday, January 10, 2019
राजनाथ सिंह एनडीए के लिए क्यों ज़रूरी हैं?
साल 2014 में बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 2014 के चुनावों से पहले एनडीए का पुनर्गठन करना शुरू किया था जो कि एक आसान काम नहीं था.
इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में एनडीए का गठन किया था. इसके बाद उनका बनाया हुआ गठबंधन 1998 से लेकर 2004 तक सत्ता में रहा.
लेकिन फिर एनडीए दस सालों के लिए सत्ता से बाहर हो गया. और एनडीए को बनाने वाले वाजपेयी भी राजनीति से संन्यास ले चुके थे.
ऐसे में 2014 में एनडीए के घटक दलों को एक छत के नीचे लाना एक जटिल काम था.
ऐसे में राजनाथ सिंह ने अपने भूले-बिसरे राजनीतिक साथियों को याद किया और ऐसे लोगों से भी हाथ मिलाए जो कि उनके पारंपरिक मित्रों में शामिल नहीं थे.
राजनाथ सिंह ने अपने अथक प्रयासों से जिस एनडीए का गठन किया वो उनके राजनीतिक गुरु अटल बिहारी वाजपेयी से भी बड़ा था.
ऐसे में कई लोगों ने राजनाथ सिंह को भविष्य के वाजपेयी के रूप में देखना शुरू कर दिया.
उल्लेखनीय बात ये है कि एनडीए के पुराने घटक दलों में से सिर्फ़ शिव सेना की विचारधारा ही बीजेपी से मेल खाती है.
इसके बाद भी जब-जब दोनों दलों के बीच किसी तरह की उठा-पटक होती थी तो वाजपेयी तत्कालीन शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे को फ़ोन करके बीच-बचाव करने की कोशिश करते थे.
साल 2014 में राजनाथ सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका को अदा किया. उन्होंने एनडीए के गठन में सामने आने वाली सभी रुकावटों को दूर कर दिया.
आज के दौर में अनुप्रिया पटेल नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हैं. लेकिन इसके बावजूद 2019 के आम चुनाव में वह 'अपना दल' के लिए पर्याप्त सीटें हासिल करने में दुश्वारियों का सामना कर रही हैं.
इसके साथ ही एक दूसरे घटक दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की बीजेपी से नाराज़गी जगज़ाहिर है.
इस दल के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंत्री हैं.
इसके बाद भी वह अपनी ही सरकार और बीजेपी के नेतृत्व की आलोचना करने में कोताही नहीं बरतते हैं.
अनुप्रिया और राजभर बीते कुछ समय में बीजेपी से दूरी बनाने के संकेत दे रहे हैं.
लेकिन अब तक बीजेपी नेतृत्व की ओर से उनकी समस्याओं के समाधान तलाशने की कोशिश नहीं की गई है.
राजनाथ सिंह की तरह संवाद स्थापित करने की जगह बीजेपी नेतृत्व अपने सहयोगी दलों को डराने-धमकाने के संकेत दे रहा है.
अब इसे घमंड कहें या बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का अति-आत्मविश्वास कि वह किसी तरह का समझौता करने और अपने सहयोगियों की मांगे मानने को तैयार नहीं दिख रहे हैं.
एनडीए के मतभेद
राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का उदाहरण लीजिए. पासवान भी बीजेपी से दूरी बनाने के संकेत दे रहे थे. और इससे बुरी बात क्या होगी कि दोनों पार्टियों में मतभेदों की बात खुलकर सामने आ रही थी.
बीजेपी के एक सूत्र के मुताबिक़, "ऐसे समय में राजनाथ सिंह जैसा अनुभवी व्यक्ति आसानी से मीडिया में आ रहे मतभेदों को पर्दे के पीछे रख सकता था और बीजेपी नेतृत्व को शर्मसार होने से बचा सकता था."
इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में एनडीए का गठन किया था. इसके बाद उनका बनाया हुआ गठबंधन 1998 से लेकर 2004 तक सत्ता में रहा.
लेकिन फिर एनडीए दस सालों के लिए सत्ता से बाहर हो गया. और एनडीए को बनाने वाले वाजपेयी भी राजनीति से संन्यास ले चुके थे.
ऐसे में 2014 में एनडीए के घटक दलों को एक छत के नीचे लाना एक जटिल काम था.
ऐसे में राजनाथ सिंह ने अपने भूले-बिसरे राजनीतिक साथियों को याद किया और ऐसे लोगों से भी हाथ मिलाए जो कि उनके पारंपरिक मित्रों में शामिल नहीं थे.
राजनाथ सिंह ने अपने अथक प्रयासों से जिस एनडीए का गठन किया वो उनके राजनीतिक गुरु अटल बिहारी वाजपेयी से भी बड़ा था.
ऐसे में कई लोगों ने राजनाथ सिंह को भविष्य के वाजपेयी के रूप में देखना शुरू कर दिया.
उल्लेखनीय बात ये है कि एनडीए के पुराने घटक दलों में से सिर्फ़ शिव सेना की विचारधारा ही बीजेपी से मेल खाती है.
इसके बाद भी जब-जब दोनों दलों के बीच किसी तरह की उठा-पटक होती थी तो वाजपेयी तत्कालीन शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे को फ़ोन करके बीच-बचाव करने की कोशिश करते थे.
साल 2014 में राजनाथ सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका को अदा किया. उन्होंने एनडीए के गठन में सामने आने वाली सभी रुकावटों को दूर कर दिया.
आज के दौर में अनुप्रिया पटेल नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हैं. लेकिन इसके बावजूद 2019 के आम चुनाव में वह 'अपना दल' के लिए पर्याप्त सीटें हासिल करने में दुश्वारियों का सामना कर रही हैं.
इसके साथ ही एक दूसरे घटक दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की बीजेपी से नाराज़गी जगज़ाहिर है.
इस दल के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंत्री हैं.
इसके बाद भी वह अपनी ही सरकार और बीजेपी के नेतृत्व की आलोचना करने में कोताही नहीं बरतते हैं.
अनुप्रिया और राजभर बीते कुछ समय में बीजेपी से दूरी बनाने के संकेत दे रहे हैं.
लेकिन अब तक बीजेपी नेतृत्व की ओर से उनकी समस्याओं के समाधान तलाशने की कोशिश नहीं की गई है.
राजनाथ सिंह की तरह संवाद स्थापित करने की जगह बीजेपी नेतृत्व अपने सहयोगी दलों को डराने-धमकाने के संकेत दे रहा है.
अब इसे घमंड कहें या बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का अति-आत्मविश्वास कि वह किसी तरह का समझौता करने और अपने सहयोगियों की मांगे मानने को तैयार नहीं दिख रहे हैं.
एनडीए के मतभेद
राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का उदाहरण लीजिए. पासवान भी बीजेपी से दूरी बनाने के संकेत दे रहे थे. और इससे बुरी बात क्या होगी कि दोनों पार्टियों में मतभेदों की बात खुलकर सामने आ रही थी.
बीजेपी के एक सूत्र के मुताबिक़, "ऐसे समय में राजनाथ सिंह जैसा अनुभवी व्यक्ति आसानी से मीडिया में आ रहे मतभेदों को पर्दे के पीछे रख सकता था और बीजेपी नेतृत्व को शर्मसार होने से बचा सकता था."
Friday, January 4, 2019
दक्षिण अफ्रीका का वो इलाक़ा, जहां इंसान नहीं पहुंच पाया
तकनीक ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि लोग कहने लगे हैं कि दुनिया बहुत छोटी हो गई है. इंसान को ये लगता है कि उसने ये दुनिया तो देख ली, इसलिए अब धरती से परे ज़िंदगी की तलाश में जुटा हुआ है. सौर मंडल और इसके बाहर अंतरिक्ष यान भेजे जा रहे हैं. ब्रह्मांड में करोड़ों किलोमीटर दूर देखने की कोशिश हो रही है.
पर, क्या वाक़ई हमने इस दुनिया का हर कोना देख डाला है? क्या अब इंसान की नज़र से इस धरती पर कुछ भी छुपा हुआ नहीं है?
ये सवाल उठा है पर्यावरण वैज्ञानिक डॉक्टर जूलियन बेलिस की खोज से. डॉक्टर जूलियन प्रकृति के संरक्षण का काम करते हैं. वो पर्यावरण वैज्ञानिक हैं. इन दिनों वो बीबीसी अर्थ की एक नई सिरीज़ के लिए काम कर रहे हैं.
इस सिरीज़ की शूटिंग 2012 में अफ्रीका में शुरू हुई थी. उन्होंने इस दौरान का एक तजुर्बा साझा किया तो दुनिया हैरान रह गई. वो अफ्रीका में शूटिंग के दौरान ऐसी जगह जा पहुंचे, जहां आधुनिक दौर का इंसान पहुंचा भी नहीं था. ये अफ्रीकी देश मोज़ांबिक के उत्तरी इलाक़े में स्थित एक पहाडी माउंट लिको की खोज का क़िस्सा है.
डॉक्टर जूलियन बेलिस, दुनिया भर में ऐसे ठिकानों की तलाश करते हैं, जिन्हें तरक़्क़ी की ठोकर मार कर छेड़ा नहीं गया है. जैसे कि दक्षिण अफ्रीका का माउंट माबू. उपग्रहों, ड्रोन, कैमरा ट्रैकिंग और रिमोट सेंसिंग की मदद से डॉक्टर जूलियन और उनकी टीम ऐसे अनछुए इलाक़ों की खोज करती है. इसके बाद इन जगहों के नक़्शे बनाए जाते हैं.
अफ्रीका की सैर के दौरान ही डॉक्टर जूलियन ने माउंट लिको को देखा था. ये पहाडी ढलानदार नहीं है, बल्कि एकदम सीधी है. इसीलिए इस पर चढ़ना बहुत बड़ी चुनौती है. क़रीब 700 मीटर ऊंची इस पहाड़ी पर हरियाली के दाग़-धब्बे हैं. और पहाड़ी के भीतर की तरफ़ गहरे हरे जंगल. असल में ये पहाड़ी कभी एक ज्वालामुखी थी, जिसके शांत होने के बाद यहां हरी-भरी ज़िंदगी पनप गई.
यह भी पढ़ें | हम क्या जन्म से ही अच्छे होते हैं या बुरे?
2012 में इसे देखने के पांच साल बाद 2017 में डॉक्टर जूलियन और उनकी टीम माउंट लिको को नए सिरे से तलाशने पहुंची. स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें ये पता चला कि अब तक कोई भी इस पहाड़ी के सिरे तक नहीं पहुंचा है. सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से उन्होंने पहाड़ी तक पहुंचने का रास्ता खोजा. इसके बाद वो गाड़ी के ज़रिए पहाड़ी के बेस पर पहुंचे. यहां से आगे का रास्ता उन्हें और उनकी टीम को पैदल ही तय करना था.
इस ज्वालामुखी की 700 मीटर ऊंची दीवारों के पार क्या है, ये पता लगाने के लिए एक ड्रोन को भेजा गया. दिक़्क़त तब हुई, जब ये ड्रोन वापसी में रास्ता भटक गया. हालांकि बाद में बड़ी मशक़्क़त से इसे सही रास्ते पर दोबारा लाया गया.
इसके बाद ड्रोन को दोबारा माउंट लिको ज्वालामुखी के मुहाने पर भेजा गया. इस बार ड्रोन जो तस्वीरें लेकर आया, वो हैरान करने वाली थीं. अंदर, जंगली बेलों का साम्राज्य था. परिंदे आबद थे. ऐसा लगा कि मानो माउंट लिको के अंदर अलग ही दुनिया आबाद थी.
इन तस्वीरों को देख कर डॉक्टर जूलियन और उनके साथी बहुत उत्साहित हुए. उन्होंने ज्वालामुखी की 700 मीटर ऊंची दीवारों के पार जाकर देखने का फ़ैसला किया. ये सीधी और तीखी चढ़ाई बेहद मुश्किल थी.
जब, दीवार जैसी पहाड़ी को चढ़कर डॉक्टर जूलियन की टीम ज्वालामुखी के अंदर पहुंची, तो वहां उन्हें एक से एक दिलचस्प चीज़ें मिलीं. पौधों की नई प्रजातियां मिलीं. तितली की एक नई नस्ल भी मिली और तमाम तरह के परिंदे देखने को मिले.
वैसे, वैज्ञानिकों का मानना है कि इस धरती पर जीवों की जितनी प्रजातियां मौजूद हैं, उनमें से केवल एक चौथाई का ही नामकरण हुआ है. डॉक्टर जूलियन बेलिस और उनकी टीम ने माउंट लिको के भीतर मौजूद कई नई प्रजातियों को खोजा. मीठे पानी का एक केकड़ा मिला. कई ऐसे छोटे स्तनधारी जीव मिले, जो इससे पहले कभी नहीं देखे-सुने गए थे. सांपों के ख़ानदान के कई नए सदस्य भी डॉक्टर जूलियन की टीम को मिले.
पर, वहां कुछ चीज़ें ऐसी भी मिलीं, जिन्होंने वैज्ञानिकों की टीम को हैरत में डाल दिया. वहां, पर कुछ मिट्टी के बर्तन उल्टे पड़े हुए मिले. यानी, डॉक्टर जूलियन की टीम से पहले भी इंसान के क़दम इस ज्वालामुखी के भीतर पड़ चुके थे.
पर, क्या वाक़ई हमने इस दुनिया का हर कोना देख डाला है? क्या अब इंसान की नज़र से इस धरती पर कुछ भी छुपा हुआ नहीं है?
ये सवाल उठा है पर्यावरण वैज्ञानिक डॉक्टर जूलियन बेलिस की खोज से. डॉक्टर जूलियन प्रकृति के संरक्षण का काम करते हैं. वो पर्यावरण वैज्ञानिक हैं. इन दिनों वो बीबीसी अर्थ की एक नई सिरीज़ के लिए काम कर रहे हैं.
इस सिरीज़ की शूटिंग 2012 में अफ्रीका में शुरू हुई थी. उन्होंने इस दौरान का एक तजुर्बा साझा किया तो दुनिया हैरान रह गई. वो अफ्रीका में शूटिंग के दौरान ऐसी जगह जा पहुंचे, जहां आधुनिक दौर का इंसान पहुंचा भी नहीं था. ये अफ्रीकी देश मोज़ांबिक के उत्तरी इलाक़े में स्थित एक पहाडी माउंट लिको की खोज का क़िस्सा है.
डॉक्टर जूलियन बेलिस, दुनिया भर में ऐसे ठिकानों की तलाश करते हैं, जिन्हें तरक़्क़ी की ठोकर मार कर छेड़ा नहीं गया है. जैसे कि दक्षिण अफ्रीका का माउंट माबू. उपग्रहों, ड्रोन, कैमरा ट्रैकिंग और रिमोट सेंसिंग की मदद से डॉक्टर जूलियन और उनकी टीम ऐसे अनछुए इलाक़ों की खोज करती है. इसके बाद इन जगहों के नक़्शे बनाए जाते हैं.
अफ्रीका की सैर के दौरान ही डॉक्टर जूलियन ने माउंट लिको को देखा था. ये पहाडी ढलानदार नहीं है, बल्कि एकदम सीधी है. इसीलिए इस पर चढ़ना बहुत बड़ी चुनौती है. क़रीब 700 मीटर ऊंची इस पहाड़ी पर हरियाली के दाग़-धब्बे हैं. और पहाड़ी के भीतर की तरफ़ गहरे हरे जंगल. असल में ये पहाड़ी कभी एक ज्वालामुखी थी, जिसके शांत होने के बाद यहां हरी-भरी ज़िंदगी पनप गई.
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2012 में इसे देखने के पांच साल बाद 2017 में डॉक्टर जूलियन और उनकी टीम माउंट लिको को नए सिरे से तलाशने पहुंची. स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें ये पता चला कि अब तक कोई भी इस पहाड़ी के सिरे तक नहीं पहुंचा है. सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से उन्होंने पहाड़ी तक पहुंचने का रास्ता खोजा. इसके बाद वो गाड़ी के ज़रिए पहाड़ी के बेस पर पहुंचे. यहां से आगे का रास्ता उन्हें और उनकी टीम को पैदल ही तय करना था.
इस ज्वालामुखी की 700 मीटर ऊंची दीवारों के पार क्या है, ये पता लगाने के लिए एक ड्रोन को भेजा गया. दिक़्क़त तब हुई, जब ये ड्रोन वापसी में रास्ता भटक गया. हालांकि बाद में बड़ी मशक़्क़त से इसे सही रास्ते पर दोबारा लाया गया.
इसके बाद ड्रोन को दोबारा माउंट लिको ज्वालामुखी के मुहाने पर भेजा गया. इस बार ड्रोन जो तस्वीरें लेकर आया, वो हैरान करने वाली थीं. अंदर, जंगली बेलों का साम्राज्य था. परिंदे आबद थे. ऐसा लगा कि मानो माउंट लिको के अंदर अलग ही दुनिया आबाद थी.
इन तस्वीरों को देख कर डॉक्टर जूलियन और उनके साथी बहुत उत्साहित हुए. उन्होंने ज्वालामुखी की 700 मीटर ऊंची दीवारों के पार जाकर देखने का फ़ैसला किया. ये सीधी और तीखी चढ़ाई बेहद मुश्किल थी.
जब, दीवार जैसी पहाड़ी को चढ़कर डॉक्टर जूलियन की टीम ज्वालामुखी के अंदर पहुंची, तो वहां उन्हें एक से एक दिलचस्प चीज़ें मिलीं. पौधों की नई प्रजातियां मिलीं. तितली की एक नई नस्ल भी मिली और तमाम तरह के परिंदे देखने को मिले.
वैसे, वैज्ञानिकों का मानना है कि इस धरती पर जीवों की जितनी प्रजातियां मौजूद हैं, उनमें से केवल एक चौथाई का ही नामकरण हुआ है. डॉक्टर जूलियन बेलिस और उनकी टीम ने माउंट लिको के भीतर मौजूद कई नई प्रजातियों को खोजा. मीठे पानी का एक केकड़ा मिला. कई ऐसे छोटे स्तनधारी जीव मिले, जो इससे पहले कभी नहीं देखे-सुने गए थे. सांपों के ख़ानदान के कई नए सदस्य भी डॉक्टर जूलियन की टीम को मिले.
पर, वहां कुछ चीज़ें ऐसी भी मिलीं, जिन्होंने वैज्ञानिकों की टीम को हैरत में डाल दिया. वहां, पर कुछ मिट्टी के बर्तन उल्टे पड़े हुए मिले. यानी, डॉक्टर जूलियन की टीम से पहले भी इंसान के क़दम इस ज्वालामुखी के भीतर पड़ चुके थे.
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